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शून्य

नौ असम अंक, और एक सम आधार,
‘आदि’ से ‘अन्त’ तक जुड़ा वह बेछोर वक्री आकार, ‘शून्य’।

सुबह के उत्तेजित मुख पर छिटका सिन्दूर,
पराजित शाम कि रगों में ठंडा होता खून!
झील की असीम शांति में सोया,
सागर लाहरों के ताण्डव में खोया ।
नीले आकाश की रिक्तता से रिक्त,
आकाश गंगा के तारों में फैला विस्तृत,
विशाल ‘शून्य’ ।

तरुणी के चंचल नयनों की थाह,
‘प्रेम – मोह’ के मध्य वह संकरी सी राह ।
सम्बंधों के चौराहे पर, संकल्पों का पेड़,
तिन – तिन कर झरते पत्ते, यह मौसम का फेर ।
खण्डित, बोझिल हृदय का एकांत,
मान – मस्तिष्क का चलता युध्द नितांत ।
सब ‘शून्य’ ।

स्वार्थता के मंच पर भावनाओं से क्रीड़ा,
पत्थर तोड़ते नाज़ुक हृदय की पीड़ा ।
तर्क तक सीमित वह ज्ञान,
प्रकृति से जूझता, असफल विज्ञान ।
लाशों के ढेर पर जनतंत्र की पताका,
‘उत्पत्ति’ के नाम पर एटम – बम का धमाका ।

और फिर ‘शून्य’ ।
पर ‘आत्म’ बेकल भटकता है, परमात्म पाने को,
विडम्बनाओं और आस्थाओं की भीड़ में ,
खोजता ‘शून्य’ को एक ‘शून्य’ ।

- संजीव शर्मा
 

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