
उँगली में धड़कन रखता है।
पूछो मत तासीर जुनूँ की
सिर पर बाँध कफ़न रखता है।
वह मड़ई का राजकुँवर हैं
धारदार उसके सपने भी
देवदारु-सा पौरुष उसका
जलते हैं उससे अपने भी
दिखता भले शिला-सा शीतल
उर में तेज़ अगन रखता है।
वह खंडहर की मूरत, जलता
आँधी में दीप सरीखा
कंगन-कुंकुम बनकर उसने
शमशानों में पलना सीखा
पग में नृत्य प्रलय का, कर में
नूतन विश्व-सृजन रखता है।
वह उठता धरती से जैसे
अंकुर फूटा हो भूतल से
वह गिरता भी तो जैसे
आशीष बरसता गगनांचल से
सूरज-चाँद उसी के, मुट्ठी में
उनचास पवन रखता है।
- बुद्धिनाथ मिश्र





