Showing posts with label poetry. Show all posts
Showing posts with label poetry. Show all posts

उत्तम पुरुष


दिल में राज़ दफ़न रखता है
उँगली में धड़कन रखता है।
पूछो मत तासीर जुनूँ की
सिर पर बाँध कफ़न रखता है।

वह मड़ई का राजकुँवर हैं
धारदार उसके सपने भी
देवदारु-सा पौरुष उसका
जलते हैं उससे अपने भी

दिखता भले शिला-सा शीतल
उर में तेज़ अगन रखता है।

वह खंडहर की मूरत, जलता
आँधी में दीप सरीखा
कंगन-कुंकुम बनकर उसने
शमशानों में पलना सीखा

पग में नृत्य प्रलय का, कर में
नूतन विश्व-सृजन रखता है।

वह उठता धरती से जैसे
अंकुर फूटा हो भूतल से
वह गिरता भी तो जैसे
आशीष बरसता गगनांचल से

सूरज-चाँद उसी के, मुट्ठी में
उनचास पवन रखता है।

- बुद्धिनाथ मिश्र

सीखो आँखें पढ़ना साहिब


सीखो आँखें पढ़ना साहिब
होगी मुश्‍किल वरना साहिब

सम्भल कर इल्जामें देना
उसने खद्‍दर पहना साहिब

तिनके से सागर नापेगा
रख ऐसे भी हठ ना साहिब

दीवारें किलकारी मारें
घर में झूले पलना साहिब

पूरे घर को महकाता है
माँ का माला जपना साहिब

सब को दूर सुहाना लागे
ढ़ोलों का यूँ बजना साहिब

कितनी कयनातें ठहरा दे
उस आँचल का ढ़लना साहिब

-गौतम राजरिशी

मन मेरा ये चाहे छू लूँ

मन मेरा ये चाहे छू लूँ
बढ़कर मैं आकाश।
राह है लम्बी जीवन छोटा
समय न मेरे पास।

फिर भी मुझको इच्छा-बल से
बढ़ना है- चढ़ना है।
रस्ता चाहे कैसा भी हो
मुझको तय करना है।
दृढ़-विश्वास जो मेरा साथी
क्यों न करूँ प्रयास।

मन मेरा ये चाहे छू लूँ
बढ़कर मैं आकाश।
राह है लम्बी जीवन छोटा
समय न मेरे पास।

जीवन के इस इक-इक पल को
मुझको यहाँ भुनाना।
सुख-चंदा-सा, दुख-सूरज-सा
सबको गले लगाना।
दिल में आशा किरण जगी फिर
तम की क्या औकात।

मन मेरा ये चाहे छू लूँ
बढ़कर मैं आकाश।
राह है लम्बी जीवन छोटा
समय न मेरे पास।

-- दुर्गेश गुप्त ''राज''

यह क्या कम है


इन चलते फिरते लोगों में, भीड़ भाड़ में
याद तुम्हारी आ जाती है, यह क्या कम है

कितनी हैं उलझनें यहाँ, रोटी पानी की
नहीं नशीले छन्द जिन्दगी रख सकते हैं
मौसम की रंगीनी, पेट नहीं भर सकती
और न ही ये सपने, तन को ढंक सकते हैं
इतनी उड़ती गर्द धूल में, अन्धकार में
छवि न तुम्हारी मिट पाती है, यह क्या कम है

कोई उत्सव नहीं, व्यर्थ की चहल पहल है
दौड़ रहे हैं लोग, नहीं फिर भी थकते हैं
छिड़ा हुआ संघर्ष, यहाँ आगे जाने का
गिर जाने की छूट, न लेकिन रुक सकते हैं
इतने शोर तमाशे में, इस कोलाहल में
हर ध्वनि तुमको गा जाती है, यह क्या कम है

आवागमन बहुत है लेकिन प्रगति नहीं है
अन्त और प्रारम्भ कि जैसे जुड़े हुए हैं
पहुँच रहे हैं लोग सभी बस एक बिन्दु पर
यों सारे पथ, जगह जगह पर मुड़े हुए हैं
इतनी कुंठाओं में, इतने बिखरेपन में
हवा तुम्हें दुहरा जाती है, यह क्या कम है

इन चलते फिरते लोगों में, भीड़ भाड़ में
याद तुम्हारी आ जाती है, यह क्या कम है

--विनोद निगम

फिर कब आएंगे


चिट्टी पत्री ख़तो किताबत के मौसम
फिर कब आएंगे?

रब्बा जाने,
सही इबादत के मौसम
फिर कब आएंगे?

चेहरे झुलस गये क़ौमों के लू लपटों में
गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में
युद्धक्षेत्र से क्या कम है यह मुल्क हमारा
इससे बदतर
किसी कयामत के मौसम
फिर कब आएंगे?

हवालात सी रातें दिन कारागारों से
रक्षक घिरे हुए चोरों से बटमारों से
बंद पड़ी इजलास
ज़मानत के मौसम
फिर कब आएंगे?

ब्याह सगाई बिछोह मिलन के अवसर चूके
फसलें चरे जा रहे पशु हम मात्र बिजूके
लगा अंगूठा कटवा बैठे नाम खेत से
जीने से भी बड़ी
शहादत के मौसम
फिर कब आएंगे?
1
-- नईम

असमय आए


तुम असमय आए, पर आए
आने का मोल
चुकाऊँ क्या?

मधु रीत गया
घट फूट गए
फेरे बसंत के
ऱूठ गए
मन भग्नप्राय, जर्जर प्रासाद
तुम असमय गाए, पर गाए
गाने का मोल
चुकाऊँ क्या?

हेठी सहकर
अनुबंधों की
तजकर गरिमा
प्रतिबंधों की
मरुथल के मूक निमंत्रण पर
तुम असमय छाए, पर छाए
छाने का मोल
चुकाऊँ क्या?
1
-- अभिज्ञात

दरबारों मे ख़ास हुए हैं


1दरबारों में
खास हुए हैं
आम लोग सारे।

गलियारों में
पहरे
...पहरे
जनता दरवाज़ों पर ठहरे,
मुट्ठी भर जनतंत्र यहाँ पर
अधिनायक सारे,

राज निरंकुश
काज निरंकुश
इनके सारे बाज निरंकुश
लोक नहीं
मनतंत्र यहाँ पर
गणनायक हारे।

ठहर गए
कानून नियम सब
खाली सब आदेश
मुफलिस की
आँखों मे आँसू

हरकारे दरवेश,
ऊँच..नीच के भेद वही हैं
काले वही,
सफ़ेद वही है
स्वेच्छाचारी औ' अनिवारक
मणिवाहक सारे।

- कमलेश कुमार दीवान

हँसी तुम्हारी चंदा जैसी


हँसी
तुम्हारी चंदा जैसी,
चितवन फूल पलाश
बातें झरना यथा ओसकण
तारों भरा उजास

गुन-गुन
भौंरों जैसे गाना,
और शरारत से मुस्काना
हौले-से,
ही हमें चिढ़ाना
वादा कर फिर हाथ न आना
चमकाती लेकिन फिर भी हो
एक किरन की आस

हँसी
तुम्हारी चंदा जैसी,
चितवन फूल पलाश
बातें झरना यथा ओसकण
तारों भरा उजास

जो भी
दिन है साथ बिताए,
जस फूलों की घाटी घर
नोंक-झोंक
विस्मृति-स्मृति में,
एक क्षीरमय सुन्दर सर
मिलना तुम से तीरथ जैसा,
भूला - बिसरा रास

हँसी
तुम्हारी चंदा जैसी,
चितवन फूल पलाश
बातें झरना यथा ओसकण
तारों भरा उजास

- क्षेत्रपाल शर्मा

Destiny

Hope is still there……..
For my dreams to come true..
My aims are still fair……
To touch the sky in blue…….
My destiny is a bit away……..
The journey is still to reach……..
I’ll always hope and stay……..
I am waiting at the beach ….
I’ll never leave my hopes…..
As I know I’ll some day shine…….
I’ll catch my ambitious ropes……..
As I know my destiny will be mine….!

Fake

The whole world is fake
the faces around us
we all seem to hate
we live a lie
up until the day we die
trying to be someone were not
not being ourselves
no matter what
all living are lives
as a sharade
letting our true selves fade and fade
why cant we all be real
tell people how we truly feel
it seems as though
this is how its always gonna be
not having a true definition of the word Me,
just simply acting to make ourselves look good
not being who we are
like we should ..

कुछ नहीं चाहा

कुछ नहीं चाहा है तुमसे
पर तुम एक खूबसूरत मोड़ हो
जहाँ ठहरने को मन करता है
कुछ पल चुनने का मन करता है
तुम्हे पकड़ पास बिठाने को मन करता है

कुछ नहीं चाहा है तुमसे
तुम एक लगाव हो
जिसे कुछ सुनाने को मन करता है
कुछ भी कहने को मन करता है
तुम्हे पुकार बस हाँ या ना कहने को मन करता है
कुछ नहीं चाहा है तुमसे
तुम एक पर खूबसूरत मोड़ हो
जहाँ ठहरने को मन करता है।

- रजनी भार्गव

आसान रास्ते

आसान रास्ते कोई और चुने
उनपर कोई और चले।
मुझे चाहिए वह रास्ता जिसमें
काँटें हों, कंकर और पत्थर हों
जो भयानक जँगलों से गुज़रे -
उस पार कोई ऐसा सूरज है
कोई ऐसी दुनिया है
जो किसी ने नहीं देखी है।
शायद मैं मर जाऊँ,
घायल हो कर गिर जाऊँ।
तो क्या?

- विक्रम मुरारका

शून्य

नौ असम अंक, और एक सम आधार,
‘आदि’ से ‘अन्त’ तक जुड़ा वह बेछोर वक्री आकार, ‘शून्य’।

सुबह के उत्तेजित मुख पर छिटका सिन्दूर,
पराजित शाम कि रगों में ठंडा होता खून!
झील की असीम शांति में सोया,
सागर लाहरों के ताण्डव में खोया ।
नीले आकाश की रिक्तता से रिक्त,
आकाश गंगा के तारों में फैला विस्तृत,
विशाल ‘शून्य’ ।

तरुणी के चंचल नयनों की थाह,
‘प्रेम – मोह’ के मध्य वह संकरी सी राह ।
सम्बंधों के चौराहे पर, संकल्पों का पेड़,
तिन – तिन कर झरते पत्ते, यह मौसम का फेर ।
खण्डित, बोझिल हृदय का एकांत,
मान – मस्तिष्क का चलता युध्द नितांत ।
सब ‘शून्य’ ।

स्वार्थता के मंच पर भावनाओं से क्रीड़ा,
पत्थर तोड़ते नाज़ुक हृदय की पीड़ा ।
तर्क तक सीमित वह ज्ञान,
प्रकृति से जूझता, असफल विज्ञान ।
लाशों के ढेर पर जनतंत्र की पताका,
‘उत्पत्ति’ के नाम पर एटम – बम का धमाका ।

और फिर ‘शून्य’ ।
पर ‘आत्म’ बेकल भटकता है, परमात्म पाने को,
विडम्बनाओं और आस्थाओं की भीड़ में ,
खोजता ‘शून्य’ को एक ‘शून्य’ ।

- संजीव शर्मा

Is sham ko ji bharke jilo

kal kya hoga, ye mat socho
tum ye dekho, ki shaam ke daaman mein kya hai
madham madham si roshaniyon mein, dhun pe machalate jismon par halki si damak
lehraati huyi sandal baahein
balkhaati huyi resham julfein
ye ang ang, ye jhalak jhalak, sheeshon ki khanak
sheeshon ko chhute naazuk labj, jinme shaam ki surkhi hai
hirani si vaishi aankhon mein, anjaane se paigaam basein
ye dekhke inko behake to ilzaam kise
in lamhon ke pyaalon mein jitni masti hai
saari ki saari tum pi lo
is shaam ko ji bharke jilo

kal jo bhi hoga dekhenge

:~ Javed Akhtar

 

Design in CSS by TemplateWorld and sponsored by SmashingMagazine
Blogger Template created by Deluxe Templates